Tuesday, April 2, 2024

*।।दो शब्द।।*

समस्त सम्माननीय धर्मावलंबियों को एवं समस्त राम भक्तों को आचार्य पंडित प्रकाश जोशी का सादर प्रणाम। जैसा कि आप सभी को विदित है कि दिनांक 22 जनवरी 2024 को अयोध्या पुरी में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम मंदिर में इस शुभ अवसर शुभ मुहूर्त, शुभ बेला, शुभ लग्न में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम दरवार में प्राण-प्रतिष्ठा एवं महोत्सव का आयोजन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी की कृपा से होना सुनिश्चित हुआ है।

ऐसे शुभ अवसर पर समस्त सम्माननीय धर्मावलंबियों एवं रामभक्त वहां आमंत्रित होंगे। इसके अतिरिक्त जो भक्त किसी कारणवश वहां पंहुचने में असमर्थ हैं उन्हें भी चाहिए कि वह इस शुभ अवसर पर अपने घर में ही अखंड दीपक प्रज्वलित कर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी के रामचरित मानस का पाठ सच्चे मन भाव से करना चाहिए। हर्षोल्लास से यह महापर्व मनाना चाहिए। यदि इतना भी संभव न हो तो कम से कम सुन्दर काण्ड पाठ अवश्य हर घर में इस शुभ मुहूर्त एवं शुभ बेला में अवश्य होना चाहिए। पाठक बन्धु आप जानते ही हैं कि आज आधुनिक युग में कुछ घरों में राम चरित मानस पुस्तक उपलब्ध नहीं हो सकती यदि है भी तो प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध नहीं है। परन्तु मोबाइल प्रत्येक व्यक्ति के पास उपलब्ध है। अतः मेरे मन में एक विचार आया कि क्यों न तुलसी दास जी कृत संपूर्ण सुन्दर काण्ड पाठ डिजिटल कर दिया जाए। यह विचार आते ही मैंने प्रभु श्री राम जी का स्मरण करते हुए सुन्दर काण्ड पुस्तक खोलकर प्रति दिन दोहे चौपाईयां टाइप करना प्रारंभ किया।

मेरे प्रिय पाठक बन्धु आप सभी के आशीर्वाद एवं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी की असीम कृपा से यह कार्य निर्विघ्नता पूर्वक पूर्ण हुआ है। इसमें शब्दों में पुर्ण सावधानी बरती गई है इसके बावजूद भी कहीं कुछ तुर्टि हुई हो तो आप मित्र समझ कर क्षमा कर दीजिए क्योंकि इंसान से भूल होना स्वाभाविक है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री रामचरित मानस ॥
पञ्चम सोपान सुन्दरकाण्ड

श्लोक
शान्तं शाश्चतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्शाशम्भुफणीनद्रसेव्यमनिश वेदान्तवेद्य विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरु मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुबरं भूपालचड़ामणिम्।।1।।
नान्या स्पूहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्ति प्रयच्छ रघुपुड्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।॥21।
अतुलितबलथामं हेमशेलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्त वातजातं नमामि ।31।
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेह तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवं सीतहि देखी। होइहि काजूु मौोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहूँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कोतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।॥।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाति चलेउ हनुमाना।।
जलनिथि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।

दोहा- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीनहें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।॥1।।

चौपाई –
जात पवनसुत देव्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।॥।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुथि प्रभुहि सुनार्वौं।
तब तव बदन पैठिहँ आई। सत्य कहँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहूँ जतन देईइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बक्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पडठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
दो०-राम काजु सबु करिहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।2।।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खुग गहई। ।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह के परिछाहीं।।
गहइ़ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपट्र कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसूत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा। ।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खंग मूग बृद दीखे मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें ।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चह पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।

छंन्द-
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउह्ट हु् सुबट् बी्थी चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।
बहुरूप निसिेचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै। /1।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहूँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बह बिधि एक एकन्ह तर्जहीं। 2।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहूँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछ एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।/3/।

दोहा-
पुर रखवारे देखि बह कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार।13।।
चौपाई
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुथिर बमत धरनीं ढनमनी॥।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
बिकल होसि तैं कपि कें मांरे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहुता। देखेँ नयन राम कर दूता।।

दो0-
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग। ।4।।
चौपाई
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।॥।
गरल सुथा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहूँ तहूँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहै भिन्न बनावा।।

दो०-
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बूंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ॥5।।
चौपाई
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महूँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृद्यँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहँ पहिचानी। साथु ते होइ न कारज हानी।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई। ।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृद्य प्रीति अति होई। ।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

दो0-
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम। 6॥॥
चौपाई
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महूँ जीभ बिचारी।।
तात कबहूँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।॥।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई। ।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु
सुनाएसि।॥।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन
सिथारी।॥।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला॥।
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहूँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि जनि करहि निदाना। ।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।

सोरठा-
कपे करि हृदयें बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हिं हरषि उठि कर गहेउ//12॥।
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चौपाई
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकड अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनै श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।॥।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दाम भय भेद देखावा।॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन थरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहूँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।॥
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

दो0-
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़धि असि बोला अति खिसिआन।9।
चौपाई
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहँं तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की। ।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहेँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कह कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।
दो0-
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
चौपाई
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।॥।
कबहूँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मूदु गाता।।
बचनु न आव नयन भरे बारी। अह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मूदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।॥
जनि जननी मानहु जियेँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।॥।

दो0-
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी थरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर। । 141।
चौपाई
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा। ।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई। ।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़धि कृपाना।।
दो0-
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
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त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेई करहु हित अपना।॥।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आस्ढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहूँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई। ।
यह सपना में कहँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
दो0-जहँ तहूँ गई सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहूँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहूँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि
भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेह तें कहु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।॥।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रियाएकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुथि नहं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई।॥।
दो०-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

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जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।॥
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरुथ कहूँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइ्हहिं रघुबीरा।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं । तिहूँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा। ।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप ते गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होह तात बल सील नि्धाना।।
अजर अमर गुननिथि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।॥।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जी तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।
दो०-देखि बुद्धि
बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयें धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

_
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरें लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कहु मारेसि कछु जाइ पुकारे।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि दैखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछू अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लैं सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
दो०-कछु मारेसि कछु म्देंसि कहछु मिलएसि थरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18॥।
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्डइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मासर मानउे महिमा मिटड़ अपार।।19।।

-_
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहु बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब अए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अतिे प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भूकुटि बिलोकत सकल सभीता। ।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका। ।
दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बथ सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँं बिषाद।॥201।
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
की थौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखरँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरड़ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखाबनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बथे सकल अतुलित बलसाली।।
दो०-जाके बल लवलेस तें जितेह चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।121 ।।

-_-
जानँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।॥।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि
बिहरावा।।
खायँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बॉँधेउ तनयँ तुम्हरे।
मोहि न कछू बाँधे कड़ लाजा। कीन्ह चहँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भरय
हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहूँ नहिं कीजे। मोरे कहें जानकी दीजै।।
दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ।॥22॥।

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राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु
कलका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।॥।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।॥।
राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिधु भगवान। ।23।।

-_-
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय
सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधथम सिखावन मोही।॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना। ।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिेआना। बेगि न हरहूँ मूढ़ कर प्राना॥।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहुता। नीति बिरोध न मारिअ दूता। ।
आन दंड कछुू करिअ गोसॉँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई। ।
सुनत बिहसिे बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहँं समुझाइ।
तेल बोरि पट बॉधि पुनि पावक देह् लगाइ।124।।
पूँछहीन बानर तहैँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लड आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँuमैं तिन्ह के प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोई रचना।॥।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहेँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेड कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
दो०-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्रहास कारि गरजा कपि बढ़ि लाग अकास।125।।

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देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई। ।
जरड नगर भा लोग बिहाला। झुपट लपट बहु कोटि कराला।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसिे रामचन्द्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।॥।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।128॥।
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जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।॥।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहि
चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।॥291।

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जामवत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरेंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोड बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु की कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहूँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुर्पतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियेँ लाए।।
कह तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
दो०-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।॥301।
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चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछू जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरड़ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरें न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
दो०-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।31।
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन कॉय मन मम गति जाही। सपनेहूँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुथान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होड़ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्रता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
दो०-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि ऋ्राहि भगवंत।।32।।

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बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि के सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु ह्ृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कह कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामूग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई। ।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई। ।
दो0- ता कहुँ प्रभु कहु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकड खलु तूल।॥33।।
नाथ भगति अति सुखदायनी। देह कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।॥।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।॥।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।॥।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी। ।
दो०-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथा।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

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प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।॥।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बेदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनै पारा। गर्जीहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ।
छं0-चिक्कराहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बह कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबतल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।॥1।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई । ।
घुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी। 12/।
दो0-एहि बिथि जाइ कृपानिधथि उतरे सागर तीर।
जहेँ तहेँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

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उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गहूँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अथिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरह। मोर कहा अति हित हियँ धरह।।
समुझत जासु दूत कड़ करनी। स्त्रवहीं गरभ्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई। ।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ।
दो0-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करह तजि टेक।।36।।

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श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महूँ भय मन अति काचा।।
जौं आवड मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हद्यँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंथु पार सेना सब आई।॥।
बूझेसि सचिव उचित मत कहह। ते सब हूँसे मष्ट करि रहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।
दो0-सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होड़ बेगिहीं नास।।371।
सोइ़ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।॥।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ़ अनुसासन। ।
जौ कृपाल पूँछिह मोहि बाता। मति अनुरुप कहँ हित ताता।।
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाई। तजउ चउथि के चंद कि नाई।
चौद्ह भूवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहड़ न कोऊ।।
दो0- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ।।38॥।

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तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।॥।
ब्रह्म अनामय अज भगविता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
गो द्विज थेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम ्रय ताप नसावन। सोड् प्रभु प्रगट समुझु जियें रावन।।
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस। ।39 (क)।॥।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कहीं पाइ सुअवसरु तात।॥39(ख)।।

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माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहड बिभीषनु पुनि कर जोरेी।/।
सुमति कुमति सब कें उर रहीं। नाथ पुरान निगम अस कहीं।।
जहाँ सुमति तहूँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहूँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥
दो0-तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होड तुम्हार।140।

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बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा। ।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु
नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहैं बारा।।
उमा संत कइ इहड बड़ाई। मंद करत जो करड़ भलाई। ।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
दो0-रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरनন अब जाऊँ देहु जनि खोरि ।॥41।।

-_-
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
देखिह जाइ चरन जलजाता। अरुन मूदुल सेवक सुखदाता।॥।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए। ।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहँ तेई।।
दो0= जिन्ह पायन्ह के पाटुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ। 142।
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एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
ताहि राखि कपीस पहिं अआए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
कह प्रभु सरखा बूझिएऐ काहा। कहड कर्पीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केिहि कारन आया।॥।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
दो0-सरनागत कहेँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि। ।431।

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कोटि बिप्र बथ लागहिं जाहू। आएँ सरन तजर्डँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पे दुष्टहदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई । ।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिट्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहूँ न कछु भय हानि कपीसा।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनई निमिष महूँ तेते।।
जौ सभीत आवा सरनाई। रखिहरँ ताहि प्रान की नाई।।
दो०=उभय भाति तेहि आनहु हैंसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।
सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वी भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठट्कि एकटक पल रोकी।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मुदु बाता।॥
नाथ दसानन कर में भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
दो0-श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।145।।

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अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।4
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि ह्ृदयँ लगावा।।
अनुज सहित मिलि ढ्िग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कह लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानऊँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।॥।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देड बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
दो0-तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहूँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहूँ सोक धाम तजि काम। ।461।
तब लगि हृद्यँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तरुन तमी अॅधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृद्येँ मोहि लावा। ।
दो0-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुज।
देखे नयन बिरेंचि सिब सेब्य जुगल पद केंज।।47I।

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सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडिे संभु गिरिजाऊ
जौं नर होई चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करँ सद्य तीहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्द परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बॉाँथ बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछ नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयेँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
दो0-सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह के द्विज पद प्रेम।।48।।
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सुनु लंकेस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामूत जानी।।
पद अंबुज गाहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसूु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड ।॥149(क)।।
जो संपति सिव रावनहि दीनहि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।149(ख)।।

-_-
अस प्रभु छाड़े भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
पुनि सर्वगत्य सर्ब उर बासी। सब्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाती।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तब सायक।॥।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
दो0-प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।50।।
**-
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होई सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंथु समीप गए रघुराई।॥।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दरभ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछे रावन दूत पठाए।।
दो0-सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयें सराहहिं सरनागत पर नेह। |51।।

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प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बॉँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।॥।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बॉधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हैंसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
दो०-कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेह न त आवा काल तुम्हार 1521।
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तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।॥।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई। ।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मूदुल चित सिंधु बिचारा।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरीM
दो0-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।53।।

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नाथ कृपा करि पूँछेह जैसें । मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बॉथि दीन्हे दुख नाना॥।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल
बिसाला।।
दो0-द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि। ॥541।
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ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ़ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।
अस में सुना श्रवन दसकधर। पदुम अठारह जूथप बदर।।
नाथ कटक महूँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष व्याला। पूरहीं न त भरि कुथर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
दो0-सहज सूर करपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम ।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

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राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।॥।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाई जुड़ावह छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
दो०-बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसे कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्तु अज ईस। /56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भूंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।156(ख)।।
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सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहूँ पगु धारा।।
दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होई न प्रीति।॥571।
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लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभू बिसिख कराला। उठी उद्थि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने। ।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
दो0-काटेहिं पड़ कदरी फरड कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पड नव नीच।॥।58।।
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कड नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए सृष्टि हेतु सब ग्रथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गर्वार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उरतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।॥।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करीं सो बेगि जी तुम्हहि सोहाई।।
दो0-सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरे कपि कटकु तात सो कहु उपाई।159।।
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नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई। ।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलथि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।॥।
एहि बिथि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहूँ
गाइअ।।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतह नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिथि भयउ सुखारी।॥।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा। ।
छं)-निज भवन गवनेउ सिंध श्ररघपतिहि यह मत भायऊ।
छं0-निज भवन गवनेउ सिंथु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघृर्पति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
दो0-सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥60।।
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामर्चरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्वमः सोपान: समाप्तः ।
(सुन्दरकाण्ड समाप्त)

आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल।

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