Sunday, March 31, 2024

*बहुत महत्वपूर्ण है अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत जानिए कथा, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं श्री गणेश चालीसा पाठ।*

पौष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।
इस बार सन 2023 में दिनांक 30 दिसंबर 2023 दिन शनिवार को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत मनाया जाएगा।

शुभ मुहूर्त
30 दिसंबर 2023 दिन शनिवार को यदि चतुर्थी तिथि की बात करें तो इस दिन 6 घड़ी 27 पाल अर्थात प्रातः 9:44 बजे से चतुर्थी तिथि प्रारंभ होगी और दिनांक 31 दिसंबर 2023 दिन रविवार को 11 घड़ी 53 पल अर्थात दोपहर 11:55 बजे तक रहेगी। यदि इस दिन के नक्षत्र की बात करें तो इस दिन अश्लेषा नामक नक्षत्र 56 घड़ी 15 पल अर्थात् अगले दिन प्रातः 5:15 बजे तक रहेगा। यदि योग की बात करें तो इस दिन विष्कुंभ नामक योग 49 घड़ी 15 पल अर्थात अगले दिन प्रात: 2:51:00 बजे तक रहेगा। इस दिन भद्रा 6 घड़ी 28 पल अर्थात प्रातः 9:44 बजे तक है।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

इस कथा के अनुसार एक समय रावण ने स्वर्ग के सभी देवी देवताओं को जीत लिया इसके
बाद उसने एक स्थान पर वानर राज बाली को संध्या करते हुए देखा और पीछे से जाकर
वानर राज को पकड़ लिया। अपनी संध्या पूजा में व्यवधान आने के कारण बाली ने अपनी संध्या उपासना के दौरान उसे अपने कांख अर्थात बगल में दबाकर रखा। वानर राज बाली 6 महीने तक लगातार संध्या पूजा करते
थे। अतः उन्होंने 6 महीने तक रावण को अपने बगल में दबाए रखा था। तदुपरांत उसे अपनी किष्किंधा नगरी ले आए और अपने पुत्र अंगद को खेलने के लिए खिलौने के रूप में दे दिया अंगद रावण को खिलौना समझ कर रस्सी से
बांध कर इधर-उधर घुमाते थे। इससे रावण को बहुत कष्ट और दुख होता था। एक दिन रावण ने दुखी मन से अपने पितामह पुलस्त्य जी को याद किया।

रावण की यह दशा देखकर पुलस्त्य जी ने विचार किया कि रावण की यह दशा क्यों हुई? उन्होंने मन ही मन सोचा
अभिमान हो जाने पर देवता मनुष्य एवं असुर सब की यही गति होती है। पुलस्त्य ऋषि ने रावण से पूछा कि तुमने मुझे क्यों याद किया? रावण बोला पितामह मैं बहुत दुखी हूँ। यह नगरवासी मुझे धिक्कारते हैं और अभी आप मेरी रक्षा करें। रावण की बात सुनकर पुलस्त्य जी बोले रावण तुम डरो नहीं तुम इस बंधन से जल्द ही मुक्त हो जाओगे। तुम विघ्न विनाशक श्री गणेश जी का व्रत करो। पूर्व काल में वृत्रासुर की हत्या से छुटकारा पाने के लिए इंद्रदेव ने भी इस व्रत को किया था। इसलिए तुम भी इस व्रत को करो। तब पितामह की आज्ञा अनुसार रावण ने भक्ति पूर्वक इस व्रत को किया और बंधन रहित हो अपने राज्य को पुनः प्राप्त किया। मान्यता अनुसार जो भी पौष मास की चतुर्थी पर इस व्रत को श्रद्धा
पूर्वक करता है उसे सफलता अवश्य ही प्राप्त होती है। तो बोलिए गणपति महाराज की जय।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के दिन ब्रह्म बेला में उठकर, भगवान
गणेश को प्रणाम कर दिन की शुरुआत करें। इसके बाद घर
को साफ करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। नित्यकर्म
से निवृत्त होकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें । स्नान के
बाद पीले वस्त्र धारण करें। सबसे पहले सूर्य देव को जल
अर्पित करें। इसके बाद पूजा घर में एक चौकी पर पीला या
लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
अब भगवान गणेश के सामने साफ आसन बिछाकर बैठ
जाएं। हथेली में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। पंचोपचार
करके पूरे विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करें।
भगवान गणेश को दूर्वा और मोदक चढ़ाएं। पूजा के दौरान
गणेश चालीसा का पाठ अवश्य करें। अपने प्रिय पाठकों के हितों को ध्यान में रखते हुए श्री गणेश चालीसा पाठ आलेख के माध्यम से लिखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है।अंत में भगवान गणेश की
आरती करें और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

।।श्री गणेश चालीसा।।
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दोहा –
जय गणपति सद्गुरु सदन कविवर बदन
कृपाल।
विध्न हरण मंगल करण जय जय
गिरिजालाल॥
चौपाई
जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण
करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व
विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुुचि शुण्ड सूुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।॥
राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूले॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥
ऋद्धि सिद्धि तव चॅँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे।॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी।॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।।
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विथि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला।॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्थान रू्प है। पलना पर बालक स्वरूप है।॥
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरिसमाना।॥
सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं।
सुर मुने जन सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शने राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥
गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो।॥
कहन लगे शनि मन सकुचाई।
का करिही शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सो बालक देखन कह्युऊ।।
पड़तहिं शानि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उडि गयो आकाशा॥

गिरजा गिरीं विकल है धरणी।
सो दुख दरशा गयो नहिं वरणी।॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्ह्ों लखिसुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज शिेर लाए॥
बालक के धड़ ऊपर धारयों।
प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे।॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन भरमि भुलाई।
रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें।॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे।॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई ।
शेष सहस मुख सकै न गाई।॥।
मैं मति हीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन बिधि विनय तुम्हारी ॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै।।
दोहा-
श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥
सम्वत् अपन सहस्त दश ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश।
लेखक ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल(उत्तराखंड)।

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